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Monday, July 22, 2024

धर्म और समाज के रक्षक थे परशुराम : कृपाशंकर

12_05_2013-12GND08गोंडा : सदैव से ब्राह्माण समाज को शिक्षित करता रहा है लेकिन अधर्म बढ़ने पर भगवान परशुराम ने आतताइयों का विनाश कर धर्म की रक्षा की। उन्होंने शास्त्र व शस्त्र को अपनाने का आह्वान किया जो वर्तमान में दिख रहा है। रविवार को सिंचाई डाकबंगले में भगवान परशुराम जयंती समारोह को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि पंडित कृपाशंकर मिश्र ने कही। उन्होंने कहा कि जब जब होइ धर्म की हानी, बढै़य असुर, अधम, अभिमानी। तब तब प्रभु धरि मनुष शरीरा , हरेह नाथ दु:ख सज्जन पीरा। यही हाल उस समय था। उस समय यही हाल था जब भगवान परशुराम ने महर्षि यमदग्नि के घर जन्म लिया। उन्होंने सूतपुत्र कर्ण को शिक्षा देकर यह प्रामाणित कर दिया कि ब्राह्माण जातिवादी नहीं होता। बशर्ते वह ज्ञानयज्ञ करता है और इसी के एवज में मिलने वाले धन से जीविका चलाता है। वह समाज में शांति, धर्म व नीति को बनाने में भूमिका अदा करता है। भगवान परशुराम ने संदेश दिया था कि बदलते परिवेश में शास्त्र व शस्त्र दोनों की जरुरत है। यह परिकल्पना हर जगह साकार होती दिख रही है। भगवान परशुराम ने आतताइयों का वध कर पृथ्वी को पापियों के भार से मुक्त किया। अन्याय करने व सहने वाला दोनों बराबर गलती का भागीदार होता है। ब्राह्माण चेतना परिषद के प्रदेश संयोजक पं.श्रीकांत पांडेय ने कहा कि ब्राह्माणों पर हमेशा जातिवादी होने का आरोप लगता है लेकिन ब्राह्माण ऐसा न कभी रहा है न ही होता है। जातिवादी वे लोग हो सकते हैं जिनकी मानसिकता संकीर्ण व सतही होती है। जो ब्राह्माण समाज को दिशा देगा उसके लिए क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र सभी बराबर होते है। मंडलीय अध्यक्ष सत्य प्रकाश शुक्ल ने कहा कि ब्राह्माण बनना आसान नहीं है। उसे काफी तपस्या कर समाज को कुछ देने के लिए कुछ अर्जित करना होता है। अगर समाज को दिशा देने का काम समाज ने किया है तो वह हमेशा देश के प्रति चिंतन शील रहा है। बृजनंदन तिवारी ने कहा कि वर्तमान में युवाओं के चेहरों पर तेज नहीं है। शिक्षा में पारंगत नहीं है। खानपान में संयम नहीं है। पानमसाला व मांस मदिरा सेवन कर वह अपने संस्कार भूल रहे है। ऐसे में उन्हें समाज में कैसे ठौर मिलेगी। अनुपम मिश्र ने कहा कि समाज को ज्ञान देने वाला ही महान हो सकता है। दान देने वाला महान हो सकता है, लेकिन गरीबों का उत्पीड़न करने वाले किसी के नहीं हो सकते हैं। अन्य वक्ताओं में पंडित शशिभूषण, विजय शुक्ल, सुशील पांडेय, शिवशंकर पांडेय, रामबुझारत द्विवेदी, दिनेश पांडेय, संतोष कुमार दूबे, रामबरन चौबे, शारदाकांत पांडेय, बाबूलाल मिश्र, जितेंद्र तिवारी, राजेश तिवारी, त्रियुगी पांडेय शामिल रहे। प्रमुख लोगों में रथीश मिश्र, भगौती पांडेय, आशीष त्रिपाठी, दिनेश पांडेय, विजय पांडेय, शैलेश शुक्ल, लवकुश, विवेक पांडेय, रागीश पांडेय, हरि प्रसाद शुक्ल, शिवलोचन, महेंद्र तिवारी, बृजमाधव तिवारी, बजरंगबली पांडेय, सुभाष पांडेय, राजेंद्र पांडेय, वैंकटेश, विद्याराम विजय, रामराज पाठक, ओम प्रकाश मिश्र, कृष्ण मोहन मिश्र, सतीश चंद्र पांडेय, राजकुमार, दिग्गज पांडेय, अशोक पांडेय आदि शामिल रहे।

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