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आधुनिक युग ने कुम्हार वर्ग की आशाओं पर फेरा पानी 

आधुनिक युग ने कुम्हार वर्ग की आशाओं पर फेरा पानी

सीतापुर-अनूप पाण्डेय,अनुराग अवस्थी/NOI-उत्तरप्रदेश जनपद सीतापुर आज के आधुनिक युग में जहां मिट्टी से बने बर्तनों की अपनी ही एक विशेष पहचान है। वहीं अमीर वर्ग के लिए फ्रिज अपना रोल अदा कर रहे हैं जबकि गरीबों के लिए मिट्टी का बना मटका आज भी फ्रिज से कम नहीं है। उल्लेखनीय हैं कि गर्मी शुरू होते ही मटकों की बिक्री में तेजी आ जाती है। किसी मुहूर्त व हवन यज्ञ में आज भी इन्हीं का ही प्रयोग किया जाता है। कुम्हारों की आजीविका का साधन मिट्टी के बर्तनों की मांग आजकल बहुत कम हो गई है। वही महंगाई की मार भी मटकों पर पड़ती नजर आ रही है जिसके चलते पुश्तैनी रूप से कार्य करने वाले कुम्हार भी अब इसे बनाने में परहेज करने लगे हैं। वर्तमान में मटके की जगह फ्रिज पानी की बंद बोतलों ने ले ली है। जहां अमीर आदमी इन आधुनिक वस्तुओं का जमकर प्रयोग कर रहे हैं, वहीं मध्यम वर्ग व गरीब वर्ग के लोग आज भी मिट्टी के बने बर्तनों में पानी पी रहे हैं। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मिट्टी से बने बर्तनों का क्रेज है। खेतों में काम करने वाले मजदूर आज भी मिट्टी से बने मटके में ही पानी खेतों में लेकर जाते हैं।

संदना कस्बे से महज 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गोपरामऊ के कुम्हार ईश्वरदीन ने बताया कि अब इस कार्य से परिवार का भरण-पोषण मुश्किल से ही हो पाता है। पहले मिट्टी आसानी से मिल जाती थी लेकिन अब मिट्टी मिलने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।इसके चलते उनको दूर दराज के गाँवो से मिट्टी लानी पड़ती है।जिससे इस धंधे बचत नही रह गयी है।

एक अन्य कुम्हार सियाराम का कहना है कि मिट्टी के बने बर्तनों का स्थान प्लास्टिक व फाइबर के बर्तन ले चुके हैं। इस कारण अब मिट्टी के बर्तन बनने बंद हो गए हैं। इसी कारण इस व्यवसाय में अब कोई आमदनी नहीं रह गई है। पहले गांवों में खाना पकाने से लेकर अन्य कार्यों में मिट्टी के बर्तनों का ही उपयोग होता था लेकिन अब पीतल व स्टील के बर्तनों ने उनका स्थान ले लिया है। एक अन्य बुजुर्ग कुम्हार ने बताया कि पहले मिट्टी से बने खिलौनों की काफी मांग हुआ करती थी और आमतौर पर गांवों व शहरों की गलियों में खिलौने खूब बिकते थे। मगर आधुनिकता की चकाचौंध में यह पूरी तरह से लुप्त हो गए हैं। अब तो त्यौहारों पर भी मिट्टी के खिलौने बिकने बंद हो गए हैं। इन हालातों के चलते कुम्हारों की स्थिति इस स्तर पर पहुंच गए है कि लोग इस व्यवसाय को छोडऩे का मन बना चुके हैं।

◼टोटी वाले मटकों की बढ़ी मांग

पहले आते वाटर कूलरों की तर्ज पर अब बाजार में टूटी लगे मटके भी आ गए हैं जिनकी मार्कीट में काफी मांग है। डाक्टरों द्वारा भी फ्रिज की बजाय मटके के पानी को अधिक महत्व देने के कारण लोग अब टूटी वाले मटके ही अधिकतर खरीदते हैं।

◼100 से 120 रुपए तक बिक रहा बड़ा मटका

गरीबों का फ्रिज कहे जाने वाले मटके पर भी महंगाई की मार है। छोटा मटका इन दिनों 60 से 80 रुपए के बीच बिक रहा है जबकि बड़ा मटका 100 से 120 रुपए तक मार्कीट में बिक रहा है। सबसे ज्यादा डिमांड सुराही की है। क्योंकि मटकों की बजाय सुराई में पानी ज्यादा ठंडा रहता है। सुराही पर भी महंगाई भारी पड़ती दिखाई दे रही है। बड़ी सुराही 150 रुपए की बिक रही है। ऐसे में साफ जाहिर है कि महंगाई के कारण अब कुम्हार वर्ग भी मिट्टी के बर्तनों को बनाने से गुरेज करने लगा है।

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