ग्यारहवीं शरीफ का पारम्परिक ऐतिहासिक कार्यक्रम नानपारा में हुआ शुरू,नानपारा स्टेट के दौर से हो रहा है ये प्रोग्राम……

अब्दुल अज़ीज़

बहराइच : (NOI) गौस ए पाक सुल्तानुल औलिया हज़रत सैय्यदना शेख अब्दुल कादिर जिलानी रजी अल्लाह तआला अनहू उर्फ बड़े पीर सरकार साहब याद में मनाया जाने वाला पर्व जिले के नानपारा कस्बे में ग्यारहवीं शरीफ का पर्व अपने रवायती अंदाज़ में मनाया जा रहा है, वैसे तो नानपारा स्टेट के दौर में ग्यारवीं शरीफ़ के आयोजन का कुछ अलग महत्व ही हुआ करता था और राजा साहब ने तो इसके लिये ब कायदा तौर पर ग्यारहवीं शरीफ की एक कोठी भी तामीर कराई थी जिसमे बाद में जनता हायर सेकेंड्री स्कूल का समचालन भी होता रहा है।राजा साहब का विसाल हो गया और उनके आश्रितों ने इस ओर कोई ध्यान नही दिया लेकिन क्षेत्र में गौस ए पाक के चाहने वालों ने इस कार्यक्रम को आज तक अपने अंदाज में मनाते आ रहे हैं,उसी क्रम में
नानपारा स्थित दरगाह गौसिया / ग्यारवीं कोठी में ग्यारवीं शरीफ़ के मौके पर प्रोग्राम जारी है, ग्यारवीं शरीफ़ के मद्देनज़र आज सुबह 9 बजे से कुरआन ख़्वानी शुरू की गई,11 बजे से लंगरे आम हुआ व 4 बजे से चादर गागर पोशी व तबरुकात का कार्यक्रम आयोजित किया जाना है।

नानपारा के इस ऐतिहासिक रियासती प्रोग्राम पर नजर डालें तो यहां का ये रियासती गैसिया बद से बेहाल हो चुका है,इसकी ऐतिहासिक इमारत आज खंडहर में तब्दील होती नजर आ रही है।
नानपारा के शहंशाह राजा जंग बहादुर ने इस इमारत की तामीर कराई थी। इस इमारत में अब्दुल कादिर जिलानी गौसे आज़म की निशानी रखकर मसनवी मजार तामीर कराई गई थी।इसके अलावा एक खास गौसिया हाल भी बनवाया गया था जिसकी संग ए बुनियाद हाजी वारिस अली शाह बाराबंकी ने रखी थी जो बाद में देश की आजादी के बाद सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की सुपुर्दगी में चली गयी नानपारा की ये कदीमी धरोहर जो आज सुन्नी वक्फ बोर्ड का वक्फ नम्बर 50 के तौर पर जाना जाता है,गौसिया हाल राजा जंग बहादुर खान ने अपने रियासती वक्त में 1885 से 1892 के बीच में बनवाई थी और तभी से माह रबीस्सानी की तारीख 9,10 और 11 को तीन रोजा ग्यारहवी का कार्यक्रम होता था जिसमें शबे रोज, मीलाद शरीफ, शमा, कुरान ख्वानी, कुल शरीफ, तकरीर, मुशायरा और बड़े पीर साहब की निशानियों की रियासत की तरफ से खाना पहुचता था बाहर से तमाम उलेमा इकरार, फुकरा, शायरा और कव्वाल आते थे। रियासत सम्भालने के बाद राजा जंग बहादुर खान ईराक के बगदाद शहर गये और कई साल बारगाहे गौस आज़म के खानकाह पर कयाम किया।

राजा जंग बहादुर खान का रहन-सहन फकीरी मिजाज का था।जब वह गौस आज़म की दरगाह से वापस आने वाले हुए तो उन्होंने वहां के जिममेदारों से गौस पाक की निशानी चाही जिसपर उस वक्त के सज्जादा नशीन ने राजा जंग बहादुर खान को सरकार गौस पाक के दाढ़ी के बाल मुबारक नक्स दशते रसूल अकरम सल0, गौस पाक की सदरी शरीफ, कासा और सिज़रा गौस पाक का दिया था साथ ही बड़े पीर साहब के मजा़र शरीफ की मिट्टी भी दी थी। राजा जंगबहादुर ने नानपारा आकर बैरूनी मुलको से राजगीर बुलवाकर नानपारा के लाल महल के निकट गौसिया हाल का निर्माण कराया तथा उसके बगल में यजा मस्जिद की तामीर करवाई।

हाल के अन्दर ही एक कक्ष बनावा कर उसमे बड़े पीर साहब की मसनवी मज़ार बनवाई और उसके अन्दर इराक से लाई गयी बड़े पीर साहब की सभी निशानी रखी गयी और तभी से यहां ग्यारहवी शरीफ धूमधाम से मनाई जाने लगी।
यहां ये भी बताते चले कि गौसिया हाल की नीव बाराबकी के हाजी वारिस पाक और राजा जंग बहादुर ने संयुक्त रूप से रखी थी, गौसिया हाल में राजा जंग बहादुर ने दूसरे देशो से बेशकीमती झाड़, फानूस, हसीन नक्कासी वाले कलाम, और बहुत बड़े-बड़े आइने मगवाकर हाल की सुन्दरता बढ़ाई थी। हाल के बाहर बरामदा औरतो के बैठने के लिए जगह बनवाई गई थी। यह सिसिला चलते-चलते राजा सआदत अली खां के समय में भी ये बड़े ही शानो शौकत के साथ चलता रहा मगर राजा सआदत अली खां ने पुराने कार्यक्रम में यह किया कि आखिरी दिन गौसिया हाल से एक जुलुस चादर के साथ जामा मस्जिद जाकर जंगबहादुर की मजा़र पर चादर बढ़ाती थी और बाद कुरान ख्वानी सामूहिक दुआ होती थी।

वर्तमान में गौसिया हाल देखरेख, मरम्मत के अभाव में अपनी बदहाली को लेकर रो रहा है हाल की एक दीवार गिर चुकी है कई सालो से रंगाई पुताई नही हुई है। सैकड़ों साल पुराना भवन यदि समय से देखरेख नही हुई तो ये सिर्फ उसकी एक कहानी बन कर रह जायेगी।
यजा मस्जिद पर तमाम अवैध कब्जेदारी हो चुकी है। सुन्नी वक्फ बोर्ड इस ऐतिहासिक धरोहर की तरफ कोई ध्यान नही दे रहा है और मात्र औपचारिकता पूरी कर अवैध कब्जेदारों को बढ़ावा दे रहा है बल्कि यूं भी कह सकते हैं कि वह इसे खुद खत्म करने पर आमादा है।

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