इरफान शाहिद:NOI।

कोरोना काल प्रवासी मज़दूरों के लिए वाकई काल बन कर आया है उनके घर वापसी पर ऐसा ग्रहण लगा है कि सरकार और सरकारी तंत्र से मज़दूरों को इस वक़्त जो मिल रहा है वो उन्हें ता उम्र याद रहने वाला है ये ऐसी यादें होंगी जो उन्हें ये सोचने पर विवश करेंगी के अपना घर छोड़ कर जाने की क्या ज़रूरत थी।हम सरकार और सरकारी तंत्र की मुख़ालफ़त ऐसे ही नही कर रहे क्योंकि प्रवासी मज़दूरों की घर वापसी की जो तस्वीरें दिखाई दे रही हैं वो ये बताने के लिए काफी है कि यहां भी सियासत है और लूट खसूट का बोलबाला है मज़दूर घर पहुंचने से पहले ही भूख प्यास से मर रहा है और सरकारी दावा है कि सबको सबकुछ मिल रहा है।

सूत्रों की माने तो सरकार ने जिन निजी बसों को प्रवासी मज़दूरों को घर पहुंचाने की ज़िम्मेदारी दी है वो निजी बस संचालक भी अपनी मनमानी कर प्रवासी मज़दूरों का शोषण करने में लगे हैं।प्रवासी मज़दूरों से उन्हें घर पहुंचाने के एवज में मोटा पैसा लिया जाता है इतना ही नही सूत्र तो ये भी बता रहें कि बसों की परमिशन के लिए डीएम आफिस की मंजूरी के लिए भी बस संचालकों को पैसा देना पड़ता है और तो और इस मामले में हमारी पुलिस को भी उनकी तरफ से एक तय धनराशि दी जा रही है कुल मिलाकर हर तरफ से प्रवासी मज़दूरों को लूटने का ही काम चल रहा है और हमारी सरकार इससे बेखबर हैं सूत्र की बात यकीन करना इसलिए सम्भव है क्योंकि आम दिनों में ऐसी घटनाएं तो आम बात हैं यहां मजबूरी का फायदा उठाने वालों का ही बोलबाला है लेकिन आपदा के इस वक़्त में मज़दूरों के साथ हो रही धन उगाही हमे ये सोचने को मजबूर कर रही है कि क्या वाकई गरीबी हमारे देश मे सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक का काम करती है सरकार के लिए।

यहां सरकार से ये गुज़ारिश है कि दिल्ली से आई इस खबर को संजीदगी से लेते हुए निजी बस संचालकों पर नज़र रखे क्योंकि ये खेल केवल दिल्ली में ही हो रहा है ऐसा नही कहा जा सकता हो सकता है पूरे देश मे मज़दूरों के साथ यही ज्यादत्ति हो रही हो और हम और आप इससे बेखबर हो।

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