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पिता बड़ा या मंदिर, यह पूछने वाले ही योगी के पक्ष में बना रहे हवा

हफ्ताभर पहले योगी आदित्यनाथ जिस संकट का सामना कर रहे थे, उसके बारे में किसने सोचा था।

किसने सोचा था कि जिन ब्राह्मणों ने यूपी में भाजपा को लाने के लिए दिन-रात एक कर दिया, सरकार बनने के बाद वे अल्पसंख्यकों से भी ज्यादा अनसेफ और असहाय महसूस करेंगे।

योगी के खिलाफ ऐसी लहर तब भी नहीं बनी, जब उन्नाव रेप केस में पूरे देश का मीडिया पीछे पड़ा था। तब भी नहीं जब सीएए-एनआरसी वाले प्रोटेस्टर्स को प्रताड़ित किए जाने की खबरें लंदन तक के अखबारों में छप रही थीं। इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की निर्मम हत्या कर दी गई, तब भी नहीं।

सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश में दलितों से ज्यादा बुरी स्थिति में मुसलमान रह रहे हैं।

केंद्र को एक कमेटी बनानी चाहिए जो पता लगाए कि यूपी का ब्राह्मण कितना भयभीत और निराश है।

ब्राह्मण महासभा का दावा है कि बीते दो साल के दौरान यहां 500 से ज्यादा ब्राह्मणों की हत्याएं हुई हैं। दो पत्रकारों को गोली मारी गई, दोनों ब्राह्मण। विकास दुबे ब्राह्मण, प्रभाष मिश्रा ब्राह्मण। कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद ने तो यूपी में ब्राह्मणों की हत्या का बाकायदा ग्राफ बनवाकर वायरल करा दिया।

हां, ब्राह्मणों में नाराजगी तो है लेकिन वह प्रदेश सरकार के खिलाफ नहीं, योगी जी के खिलाफ है।

लेकिन कहानी बदली 25 जुलाई के बाद। पांच अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर का भूमि पूजन है। 25 जुलाई को योगी कार्यक्रम की तैयारी का जायजा लेने अयोध्या पहुंचे थे।

एक वर्ग ने कहा कि जब प्रदेश में कोरोना के चंद हजार मरीज थे तब योगी महामारी से लड़ने में व्यस्त होने का कारण बताकर अपने पिता की अंत्येष्टि तक में नहीं गए और अब जब यूपी कोरोना का केंद्र बनता जा रहा है, राम मंदिर के प्रीस्ट (पुजारी) तक संक्रमित हैं, वह मंदिर निर्माण में जुटे हैं। मुख्यमंत्री को अब महामारी से लड़ने की चिंता नहीं क्या?

पैदा करने वाला पिता बड़ा या मंदिर?

परमहंस रामचंद्र दास की 16वीं पुण्यतिथि पर एक कार्यक्रम में हिस्सा लेते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ।

लखनऊ के स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि सीएम योगी के कट्टर आलोचकों का यह सवाल उनके पक्ष में हवा बना रहा है। वही हवा 25 जुलाई से पहले तक योगी के खिलाफ थी। जो काम पिट्ठू मीडिया न कर सका, कई-कई सलाहकार न कर सके, दिन-रात विरोध करने वाले कर रहे हैं।



यह टिप्पणी हमारे लिए प्रियांशू ने लिखी है। यह उनके निजी विचार हैं। वह दिल्ली के भारतीय जन संचार संस्थान के पूर्व छात्र हैं। अमर उजाला और राजस्थान पत्रिका जैसे मीडिया हाउस के साथ काम कर चुके हैं।

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