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जब याचिकाएं हाथों-हाथ ली जाती थीं, अदालत केंद्रीय मंत्री तक को भेज रही थी जेल

जब याचिकाएं हाथों-हाथ ली जाती थीं, अदालत केंद्रीय मंत्री तक को भेज रही थी जेल

कार्टून साभार

प्रियांशू

साल 2012, सरकार मनमोहन सिंह की थी। प्रशांत भूषण ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में याचिका लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से जांच करने को कहा। दूरसंचार मंत्री ए राजा को इस्तीफा देना पड़ा। जेल तक भेजे गए। कोर्ट ने स्पेक्ट्रम आवंटन भी रद्द कर दिया।

प्रशांत कोल ब्लॉक आवंटन को यह कहकर सर्वोच्च अदालत ले गए, ‘नेताओं ने कुछ कंपनियों का फेवर किया है।’ जांच हुई। इसके भी आवंटन रद्द कर दिए गए।

प्रशांत गोवा में हो रहे अवैध लौह अयस्क खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। कोर्ट ने खनन पर रोक लगा दी।

लोकसभा में तब की विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस की नियुक्ति पर सवाल उठाए। मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले गए प्रशांत। कोर्ट ने थॉमस की नियुक्ति को अवैध बताया।

प्रशांत हिंदुस्तान और भारत पेट्रोलियम के निजीकरण के लिए संसद की मंजूरी अनिवार्य बनवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। याचिका मंजूर हुई। केंद्र को नियम बनाना पड़ा।

अब आती है मोदी गवर्नमेंट

साल 2018, जस्टिस लोया की मौत की निष्पक्ष जांच के लिए प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट पहुंचते हैं। सुनवाई से इनकार।

रफाल सौदे में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए प्रशांत याचिका दाखिल करते हैं। याचिका सुनवाई के योग्य नहीं।

सचूना आयुक्तों के खाली पदों को भराने प्रशांत सुप्रीम कोर्ट गए। जज बोले- रहने दीजिए। हर कोई अवैध नहीं कर रहा।

प्रशांत लॉकडाउन के कारण पलायन करने वाले हजारों-हजार कामगारों के मौलिक अधिकार लागू कराने की आस लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं। अदालत दो टूक कहती है, ‘आपको व्यवस्था पर भरोसा ही नहीं।’

भाजपा नेता की बाइक पर बैठे दिखे न्यायमूर्ति। प्रशांत ने सवाल उठाए। कोर्ट प्रशांत से चिढ़ हुई है।

नागपुर में हार्ले डेविडसन की जिस बाइक पर जस्टिस बोबडे नजर आए थे वह बीजेपी नेता सोनबा मुसाले के बेटे रोहित सोनबा जी मुसाले के नाम से रजिस्टर्ड है।

यही देश था, यही अदालत थी और यही प्रशांत भूषण थे।

साल 2009, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की न्यायमूर्तियों को आरटीआई के दायर में लाने और उन्हें अदालत की वेबसाइटों पर अपनी संपत्ति के बारे में बताने को बाध्य कराने के केस में यही प्रशांत भूषण पैरवी कर रहे थे।

सवाल किसी नेता की बाइक पर किसी जज के सिर्फ बैठने भर का नहीं था, पूरी संपत्ति पर था, एक-एक जज के आचरण पर सीधी उंगली उठाई गई थी। लेकिन अदालत बिगड़ी नहीं उसने प्रशांत की बात मान ली, बड़ी ही सहिष्णुता से।

बस, वह देश दूसरा था और यह देश दूसरा है।


लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली के पूर्व छात्र हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।

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