लॉकडाउन लगने के कारण महानगरों से अपने गांवों को पैदल ही पलायन करते मजदूर। फोटो : साभार

प्रियांशू

देश आजाद ही हुआ था। सर्दियों के दिन थे। एक संस्था ने नेहरू से अनुरोध किया वे रात को फुटपाथ पर सोने वाले गरीबों को कंबल बांटने में उनका हाथ बटाएं।

उस रात प्रधानमंत्री ने ठिठुर रहे लोगों को कंबल ओढ़ाए।

पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने अपनी आत्मकथा ‘बियोंड द लाइंस’ में लिखा, ‘इनकी हालत देखकर नेहरू ने कहा था कि ये लोग बगावत क्यों नहीं करते?’

जो लोग चंद साल पहले, लाठियां खा-खाकर दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को खदेड़ चुके थे उनमें सरकार से अब एक कंबल तक मांग पाने की हिम्मत न बची थी।

आग ठंडी पड़ चुकी थी और क्रांति हवा बनकर उड़ गई।

नेहरू न सिर्फ अफसोस प्रकट कर रहे थे, वह क्षुब्ध थे। इनकी स्थिति से ज्यादा, इनकी खामोशी पर क्षुब्ध। वह इनके न भड़कने पर भड़के हुए थे।

नेहरू चाहते थे कि यहां फुटपाथ पर मरने से अच्छा है ये लोग जाकर पार्लियामेंट घेर लें। जैसे कवि गोरख पांडे चाहते थे। अपने ही खेत में जाते और वहां काम कर रहे मजदूरों से जाकर कहते कि मेरे जमींदार पिता की जमीन पर तुम लोग कब्जा कर लो।


लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व छात्र हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।

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