एशिया का सबसे बड़ा भारतीय रेलवे नेटवर्क और मानव रहित क्रासिंग पर होने वाले हादसों पर विशेष

सीतापुर-अनूप पाण्डेय,अमरेंद्र पाण्डेय/NOI

सम्पादकीय
भारतीय रेलवे एशिया में सबसे बड़ा नेटवर्क माना जाता है और इसका विस्तार लगातार जारी है।रेलवे नेटवर्क को संचालित करने के लिए अधिकारियों कर्मचारियों की बड़ी फौज है जो अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करके रेल यात्रा को नियमित नियन्त्रित संरक्षित कर यात्रियों की यात्रा को मंगलमय बनाता है। इन जिम्मेदार अधिकारियों कर्मचारियों की जरा सी चूक बड़े हादसे का सबब बन जाती है जिसमें तमाम बेगुनाहों की जान चली जाती है और लोग अपंग हो जाते हैं।वैसे रेलवे ट्रैफिक कंट्रोल ही नहीं करता है बल्कि सिंगनल सिस्टम से आवागमन को सुरक्षित और सुलभ भी बनाता है। इतना ही नहीं हर एक रेलमार्ग पर पड़ने वाली क्रासिंगों पर सिंगनल व्यवस्था की जाती है ताकि कोई भिडंत न होने पाये।रेलवे चाहे जितनी बुलंदियों पर पहुंच कर बुलेट ट्रेन चलाने जा रहा हो लेकिन दुख और शर्म की बात है कि रेलवे इतिहास के इतने लम्बे समय गुजर जाने के बावजूद अबतक अपनी हर क्रासिंग को सुरक्षित नहीं कर पाया है और तमाम ऐसी क्रासिंग हैं जहाँ पर रेलवे की तरफ से बचाव की कोई व्यवस्था नहीं की गयी है और यही मानव सिंगनल रहित क्रासिंग आये दिन कलंकित कर बेगुनाहों की जान लेती रहती हैं।जिन क्रासिंगों पर सिंगनल की व्यवस्था है वहाँ पर तो लोग ट्रेन आने की राह नहीं देखते हैं और दाहिने बांये कूद फाँदकर निकलते रहते हैं और जहाँ पर कोई गेट या सिंगनल नहीं होता है वहाँ तो लोग ट्रेन नजदीक आने के बावजूद लाइन क्रास करते रहते हैं क्योंकि आज हर आदमी जल्दी में रहता है। इसी जल्दबाजी के चलते इन मानव रहित रेलवे लाइन क्रासिंगों पर आये दिन हादसे होते रहते हैं और असमय लोगों की जानें चली जाती हैं।कभी टैक्ट्रर तो कभी बस तो कभी जीप कार मैजिक जैसे सवारी वाहन इन मानव रहित क्रासिंगों पर ट्रेन से टकरा कर दिल दहला देने वाली घटनाओं को अंजाम दे देते हैं। वाहन चालकों को भी इतनी जल्दी रहती है कि वह जान हथेली पर लेकर घुस जाते हैं और इधर उधर लाइन भी नहीं देखते हैं। जबसे स्मार्ट फोन आ गया है तबसे वाहन चालक कान में एअरफोन लगाकर गाना या स्टोरी सुनते हुए रेलवे लाइनों को क्रास करते हैं और जरा सा चुकने पर अपने साथ तमाम बेगुनाहों का काल के गाल में ढकेल देते हैं। अभी परसों इसी तरह कुशीनगर में मानव रहित क्रासिंग होने तथा वाहन चालक के कान में एअरफोन की लीड लगी होने की कारण एक दर्जन से ज्यादा मासूम बेगुनाह स्कूलों बच्चों की जान चली गई।यह स्कूली बच्चों से भरी मैजिक सवारी वाहन सीवान से गोरखपुर जाने वाली रेलवे लाइन के दुदही-बहपुरवा मानव रहित क्रासिंग पर पैसेंजर ट्रेन से टकरा गया और वाहन के साथ ही उसमें बैठे बच्चों के भी परखच्चे उड़ गये।जिस समय कान में एअरफोन की लीड डाले इतनी तेज रफ्तार में था कि लोगों के चिल्लाकर रोकने की आवाज तक उसे नही सुनाई पडी।घटना सुबह करीब साढे छः बजे हुयी मैजिक वैन में बच्चे अपने अपने पापा मम्मी को टाटा बांय करके शिक्षा के मंदिर में जा रहे थे।आज हम इस हादसे में मारे गये मासूम स्कूली बच्चों की आत्मा की शांति एवं परिजनों को इस अपार असहनीय पीड़ा को सहने की शक्ति प्रदान करने की ईश्वर से कामना करते हैं और दिल की गहराइयों एवं सजल नयनों से श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।रेलवे की क्रासिंगों पर सुरक्षा व्यवस्था में लापरवाही एक और हादसे को जन्म देकर पुराने हादसों के घावों को ताजा कर दिया है।हमेशा की तरह इस बार भी सरकार ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी आरटीओ और एक परिवहन अधिकारी को इस घटना के लिए उत्तरदायी मानकर उन्हें निलम्बित कर दिया गया है।इतना ही नहीं हमारे मुख्यमंत्री योगीजी तत्काल मौके पर पहुंचे और गोरखपुर मेडिकल कालेज में भर्ती घायलों को देखकर उनके समुचित इलाज के साथ ही मृत बच्चों के परिजनों को दो दो लाख रुपये सहायता देने की घोषणा की है। टक्कर इतनी जबरदस्त हुयी कि वैन करीब बीस मीटर दूर एक गढ्ढे में जा गिरी।घटना के बाद आसपास के गाँवों में हाहाकार मच गया और पलक झपकते ही हजारों लोग मदद देने पहुंच गये वरना् मृतक बच्चों की संख्या बढ़ सकती थी। इस समय गाँव गाँव गली गली स्कूल भी पान गुटखा मसाला की तरह दूकानों जैसे स्कूल खुलते जा रहे हैं और बिना रजिस्ट्रेशन कराये ही स्कूल चला रहें हैं ।इतना ही नहीं बल्कि बच्चों को उनके घर लाने और वापस ले जाने के लिये निजी या किराये की खड़खड़ा मैजिकों आदि वाहन भी उपलब्ध कराते हैं। यह सही है कि इन इन विद्यालयों को विभागीय अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त रहता है। इस घटना से जहाँ शिक्षा विभाग एआरटीओ की लापरवाही हरामखोरी का एक फिर पर्दाफाश हुआ है वहीं रेलवे विभाग फिर एक बार अपनी व्यवस्था के सवाल पर कटघरे में खड़ा हो गया है।बदलते आधुनिक रेलवे परिवेष में हर क्रासिंग पर सिंगनल या गेट बंद करने वाले की व्यवस्था न हो पाना रेलवे के बड़प्पन पर प्रश्न चिन्ह लगाने जैसा है।

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